समय पर नहीं चलती का नाम रेलगाड़ी। टाटानगर में लेटलतीफी अब समस्या नहीं, ‘रेल संस्कृति’ बन चुकी है।
भारतीय रेल का चक्रधरपुर डिवीजन शायद दुनिया का पहला ऐसा रेल मंडल बनने की ओर अग्रसर है जहाँ ट्रेनों का समय पर न पहुँचना ही “सामान्य परिचालन” माना जाने लगा है। हालत यह है कि पिछले लगभग चार वर्षों से टाटानगर जैसे प्रमुख जंक्शन पर समय से ट्रेन पहुँच जाना किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता।
व्यंग्य यह है कि रेलवे अब भी टाइमटेबल छापता है — मानो उसका वास्तविकता से कोई संबंध बचा हो। यात्रियों की स्थिति ऐसी है कि वे अब घड़ी देखकर नहीं, बल्कि रेलवे की कृपा देखकर सफर की योजना बनाते हैं।
इतने वर्षों तक यह अव्यवस्था इसलिए भी फलती-फूलती रही क्योंकि जनप्रतिनिधियों की ओर से अपेक्षित दबाव शायद कभी बना ही नहीं। लेकिन पिछले कुछ समय से जमशेदपुर पश्चिम के विधायक Saryu Roy इस मुद्दे को लेकर मुखर दिख रहे हैं। उन्होंने टाटानगर रेलवे स्टेशन पर धरना दिया, डीआरएम और रेल अधिकारियों के साथ बैठकें कीं और स्पष्ट कहा कि सवारी गाड़ियों को समय पर चलाया जाए।
परिणाम?
रेल प्रशासन ने शायद इसे भी “सुझाव” की श्रेणी में डाल दिया।
स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी परियोजना मानी जाने वाली Vande Bharat Express भी टाटानगर स्टेशन पर समय की पाबंदी निभाने में संघर्ष करती दिखाई देती है। यात्रियों से प्रीमियम किराया वसूला जाता है, लेकिन प्राथमिकता अब भी मालगाड़ियों को ही मिलती दिखती है। यात्री ट्रेनें आउटर पर खड़ी रहती हैं और मालगाड़ियाँ पूरे सम्मान के साथ आगे बढ़ती जाती हैं — मानो रेलवे ने अनौपचारिक रूप से तय कर लिया हो कि “माल महत्वपूर्ण है, यात्री प्रतीक्षारत रहें।”
अगर इस समस्या की जड़ में जाएँ तो स्पष्ट होगा कि यह अव्यवस्था रातोंरात पैदा नहीं हुई। यह वर्षों की चुप्पी, सहनशीलता और सरकारी उदासीनता की संयुक्त उपलब्धि है।

यात्रियों के आत्मसम्मान पर पहला बड़ा प्रहार तब हुआ था जब टिकटों पर यह संदेश छपना शुरू हुआ कि आपकी यात्रा का “57 प्रतिशत भार सरकार वहन करती है।” लोकतंत्र में कर देने वाले नागरिकों को यह बताना कि उन पर “उपकार” किया जा रहा है, कम से कम संवेदनशील संवाद तो नहीं कहा जा सकता। लेकिन जनता चुप रही। रेलवे का आत्मविश्वास बढ़ता गया।
फिर शायद यह सोच बनी कि जब यात्री शिकायत के बजाय समझौता कर चुके हैं, तो क्यों न सवारी गाड़ियों को किनारे लगाकर माल परिवहन को प्राथमिकता दी जाए — क्योंकि मुनाफा वहीं है।
यहीं से टाटानगर में लेटलतीफी की वह कहानी शुरू हुई जो अब नासूर बन चुकी है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि एक वरिष्ठ विधायक, जो राज्य सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं, उन्हें जनता के मुद्दे पर सड़क पर उतरकर आंदोलन करना पड़ रहा है। इसके बावजूद रेल प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। ऐसे में आम यात्री की हैसियत क्या रह जाती है, यह समझना कठिन नहीं।
इसी क्रम में आज साकची गोलचक्कर पर Saryu Roy के नेतृत्व में सवारी गाड़ियों की लेटलतीफी के विरोध में हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। अब देखना यह है कि यह आंदोलन आगे किस रूप में विकसित होता है और क्या रेलवे कभी यात्रियों को “समय” नामक सुविधा लौटाने की आवश्यकता महसूस करेगा।
यह मुद्दा केवल ट्रेनों की देरी का नहीं, बल्कि करोड़ों यात्रियों के समय, सम्मान और अधिकार का है।
इस विषय पर हमारी विस्तृत रिपोर्ट आगे भी जारी रहेगी, क्योंकि जन सरोकार से जुड़े मुद्दों पर सवाल पूछना ही पत्रकारिता का वास्तविक दायित्व है।